Sacred Hymn · 31 Verses

॥ आदित्य हृदय स्तोत्र ॥

Aditya Hridaya Stotra

संपूर्ण आदित्य हृदय स्तोत्र — सभी 31 श्लोक हिंदी अर्थ सहित, MP3 ऑडियो, मुफ्त PDF डाउनलोड, और पाठ विधि। महर्षि अगस्त्य द्वारा भगवान श्री राम को सिखाया गया यह दिव्य सूर्य स्तोत्र।

Opening Verse · श्लोक 1

आदित्यहृदयं पुण्यं
सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपेन्नित्यम्
अक्षयं परमं शिवम् ॥

"यह पवित्र आदित्य हृदय सब शत्रुओं का नाश करने वाला, विजय प्रदान करने वाला और परम कल्याणकारी है।"

Valmiki Ramayana · Yuddha Kanda
Complete Stotra

All 31 Verses with Hindi Meaning

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॥ ध्यानम् ॥
नमस्सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाशहेतवे।
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरिञ्चिनारायणशङ्करात्मने ॥

Verse · श्लोक 1
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥

तब युद्ध से थके हुए और चिंता में डूबे हुए श्री राम को युद्धभूमि पर देखकर, और सामने रावण को युद्ध के लिए तैयार खड़ा देखकर —

Verse · श्लोक 2
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपागम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥

उस समय देवताओं के साथ युद्ध देखने आए हुए भगवान अगस्त्य ऋषि श्री राम के पास आए और उनसे यह वचन कहा —

Verse · श्लोक 3
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥

हे महाबाहु राम! हे वत्स! एक सनातन गोपनीय रहस्य सुनो, जिसके द्वारा तुम युद्ध में अपने सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करोगे।

Verse · श्लोक 4
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम् ॥

आदित्य हृदय नामक यह स्तोत्र परम पुण्यदायक, सभी शत्रुओं का नाश करने वाला, विजय प्रदान करने वाला, नित्य अक्षय फल देने वाला और परम कल्याणकारी है। इसका नित्य जप करना चाहिए।

Verse · श्लोक 5
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥

यह स्तोत्र सब मंगलों का भी मंगल है, सब पापों का नाश करने वाला है, चिंता और शोक को मिटाने वाला तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम स्तोत्र है।

Verse · श्लोक 6
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥

उदय होते हुए, अपनी किरणों से प्रकाशित, देवताओं और असुरों द्वारा वंदित, समस्त लोकों के स्वामी, प्रकाश के स्रोत भगवान सूर्य की पूजा करो।

Verse · श्लोक 7
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥

ये सूर्य देव सभी देवताओं के स्वरूप हैं, अत्यंत तेजस्वी हैं और अपनी किरणों से सभी प्राणियों को सत्ता प्रदान करते हैं। ये अपनी किरणों से देवताओं, असुरों और समस्त लोकों का पालन करते हैं।

Verse · श्लोक 8
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥

ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा और जल के स्वामी वरुण हैं।

Verse · श्लोक 9
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राणः ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥

पितृगण, वसुगण, साध्यगण, अश्विनी कुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, प्राण, ऋतुओं के रचयिता और प्रकाश के दाता — ये सब सूर्य देव के ही स्वरूप हैं।

Verse · श्लोक 10
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥

आदित्य, सविता, सूर्य, खग (आकाश में चलने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान (किरणों के स्वामी), सुवर्ण के समान कांतिमान, भानु, हिरण्यरेता (स्वर्ण-तेज के स्रोत), दिवाकर (दिन के रचयिता) — ये सब सूर्य के नाम हैं।

Verse · श्लोक 11
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्डकोंऽशुमान् ॥

हरित वर्ण के घोड़ों वाले, सहस्र किरणों से युक्त, सात अश्वों वाले रथ पर सवार, किरणों से सुशोभित, अंधकार का नाश करने वाले, कल्याणस्वरूप, सृष्टि के निर्माता, मार्तण्ड और अंशुमान — ये भी सूर्य देव के नाम हैं।

Verse · श्लोक 12
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः ।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥

हिरण्यगर्भ (स्वर्णिम गर्भ वाले), शिशिर (शीतलता प्रदान करने वाले), तपन, भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, अदिति के पुत्र, शंख (आनंदस्वरूप) और शिशिरनाशन (शीत का नाश करने वाले) हैं।

Verse · श्लोक 13
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ॥

ये आकाश के स्वामी, अंधकार का भेदन करने वाले, ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामवेद के पारगामी, घनघोर वर्षा करने वाले, जल के मित्र और विन्ध्य पर्वत की वीथी में तीव्र गति से चलने वाले हैं।

Verse · श्लोक 14
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः ।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥

ये तापमान, मण्डलाकार, मृत्युस्वरूप, पीले वर्ण वाले, सब को तपाने वाले, क्रांतदर्शी कवि, विश्वरूप, महातेजस्वी, रक्तवर्ण और सम्पूर्ण उत्पत्ति के मूल कारण हैं।

Verse · श्लोक 15
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥

नक्षत्रों, ग्रहों और तारों के स्वामी, विश्व को उत्पन्न करने वाले, समस्त तेजों में भी अत्यंत तेजस्वी, द्वादश आदित्य रूपों वाले — हे सूर्य देव! आपको नमस्कार है।

Verse · श्लोक 16
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥

उदयाचल (पूर्व पर्वत) को नमस्कार। अस्ताचल (पश्चिम पर्वत) को नमस्कार। ज्योतिर्मण्डलों के स्वामी और दिन के अधिपति को नमस्कार है।

Verse · श्लोक 17
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥

विजयस्वरूप, विजय-कल्याण को देने वाले, हरित अश्वों वाले प्रभु को बार-बार नमस्कार। सहस्र किरणों वाले आदित्य देव को बार-बार प्रणाम है।

Verse · श्लोक 18
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥

उग्र, वीर, सारंग (शीघ्र गति वाले) को नमस्कार। कमल को विकसित करने वाले और मार्ताण्ड स्वरूप को बार-बार नमस्कार है।

Verse · श्लोक 19
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥

ब्रह्मा, शिव और विष्णु के स्वामी, आदित्य-तेज से युक्त सूर्य देव को, प्रकाशमान, सर्वभक्षी (प्रलयकाल में) और रुद्र-रूप वाले प्रभु को नमस्कार है।

Verse · श्लोक 20
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥

अंधकार के नाशक, हिम (शीत) के नाशक, शत्रुओं के नाशक, अनंत आत्मा वाले, कृतघ्नों के विनाशक, समस्त ज्योतियों के स्वामी देव सूर्य को नमस्कार है।

Verse · श्लोक 21
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥

तपे हुए स्वर्ण के समान कांतिमान, अग्निस्वरूप, विश्व के निर्माता, अंधकार के पूर्ण विनाशक, कांतिमय, लोकसाक्षी सूर्य देव को नमस्कार है।

Verse · श्लोक 22
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥

ये ही प्रभु समस्त प्राणियों का संहार करते हैं और वही पुनः उनकी सृष्टि करते हैं। अपनी किरणों से ये जल का पान करते हैं, तपाते हैं और वर्षा करते हैं।

Verse · श्लोक 23
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥

ये सब प्राणियों के सोने पर भी अंतःकरण में स्थित होकर जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र हैं और अग्निहोत्र करने वालों को मिलने वाला फल भी ये ही हैं।

Verse · श्लोक 24
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥

वेद, यज्ञ, यज्ञों का फल, और सम्पूर्ण लोकों में जितने भी कर्म हैं — सब के स्वामी ये भगवान सूर्य ही हैं।

Verse · श्लोक 25 (Phalashruti)
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥

हे राघव! आपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में अथवा किसी भय की स्थिति में जो कोई भी पुरुष इन सूर्य देव का कीर्तन (स्तुति) करता है, वह कभी दुखी नहीं होता।

Verse · श्लोक 26
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥

इसलिए हे राम! एकाग्रचित्त होकर देवों के देव जगत्पति सूर्य की पूजा करो। इस आदित्य हृदय का तीन बार जप करने पर तुम युद्ध में निश्चय ही विजय प्राप्त करोगे।

Verse · श्लोक 27
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि ।
एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥

हे महाबाहु! इसी क्षण में तुम रावण का वध कर डालोगे। ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य जैसे आए थे वैसे ही चले गए।

Verse · श्लोक 28
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥

यह सुनकर महातेजस्वी श्री राम का शोक नष्ट हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर एकाग्र चित्त से इस स्तोत्र को धारण किया।

Verse · श्लोक 29
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥

सूर्य की ओर देखकर इस स्तोत्र का तीन बार जप करने पर श्री राम को परम हर्ष प्राप्त हुआ। तीन बार आचमन करके पवित्र होकर वीर राम ने अपना धनुष उठाया।

Verse · श्लोक 30
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् ।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥

प्रसन्न मन से रावण को देखकर वे युद्ध के लिए तत्पर हो गए और महान् यत्नपूर्वक उसका वध करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

Verse · श्लोक 31 (Final)
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥

तब रावण के विनाश का समय निकट जानकर देवताओं के बीच में स्थित प्रसन्नचित्त भगवान सूर्य ने अत्यंत हर्ष से श्री राम की ओर देखकर "शीघ्रता करो" — ऐसा कहा।

॥ इति आदित्य हृदय स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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आदित्य हृदय स्तोत्र — संपूर्ण पाठ

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The Origin Story

Taught on the Battlefield of Lanka

जब श्री राम लंका की रणभूमि में रावण से युद्ध करते-करते थक चुके थे, चिंतामग्न और शोकग्रस्त थे — तब महर्षि अगस्त्य देवताओं के साथ उन्हें देखने आए। राम की पीड़ा देखकर उन्होंने एक अत्यंत गुप्त और शक्तिशाली स्तोत्र उन्हें सिखाया, जो सदियों से ऋषियों के पास सुरक्षित था।

यही है आदित्य हृदय स्तोत्र — सूर्य देव की दिव्य स्तुति। इसके पाठ से श्री राम को नई शक्ति मिली, उन्होंने रावण का वध किया, और धर्म की पुनः स्थापना की। आज भी विश्वभर में लाखों भक्त इसी स्तोत्र का पाठ विजय, स्वास्थ्य, और मानसिक शांति के लिए करते हैं।

यह स्तोत्र वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के 107वें सर्ग में संकलित है — 31 श्लोकों में रचित यह दिव्य संवाद एक युग का रुख मोड़ने वाला सिद्ध हुआ।

Sacred Benefits

Benefits of Daily Recitation

हज़ारों वर्षों से ऋषि-मुनि, राजा और सामान्य भक्त इस स्तोत्र का पाठ करते आए हैं। शास्त्र इन फलों की बात करते हैं।

01

Victory Over Enemies

शत्रुओं पर विजय — आंतरिक और बाह्य दोनों। हर चुनौती का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।

02

Health & Vitality

सूर्य देव प्राण-शक्ति के स्वामी हैं। नियमित पाठ शारीरिक स्वास्थ्य और ऊर्जा को बढ़ाता है।

03

Mental Clarity

मन की उलझन, भय और अवसाद को दूर करता है। चित्त को सूर्य की भांति स्थिर और प्रकाशमान बनाता है।

04

Spiritual Awakening

परम प्रकाश की भक्ति का मार्ग — शाश्वत, अपरिवर्तनीय, सदा प्रकाशमान।

05

Removes Negativity

जैसे सूर्योदय अंधकार मिटाता है, यह स्तोत्र नकारात्मक प्रभावों और कर्म-बाधाओं को दूर करता है।

06

Success in Endeavors

परीक्षा, युद्ध, यात्रा, नए कार्यों — किसी भी महत्वपूर्ण आरंभ से पूर्व इसका पाठ करें।

The Practice

How to Recite Properly

शास्त्र-सम्मत विधि — श्रद्धा और भक्ति के साथ अनुसरण करने पर साधना गहरी होती है।

I

Wake Before Sunrise

ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 90 मिनट पूर्व) सबसे शुभ समय है। स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।

II

Face East

उगते सूर्य की ओर मुख करके बैठें। सूर्य देव को अर्घ्य (जल) अर्पित करें।

III

Chant Three Times

पूर्ण एकाग्रता के साथ संपूर्ण स्तोत्र का तीन बार पाठ करें। प्रत्येक पाठ प्रभाव को गहरा करता है।

IV

Sunday Special

रविवार — सूर्य देव का दिन — और रथ सप्तमी का पाठ विशेष फलदायी होता है।

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Common Questions

Frequently Asked

आदित्य हृदय स्तोत्र क्या है? +

आदित्य हृदय स्तोत्र सूर्य देव को समर्पित एक पवित्र संस्कृत स्तोत्र है, जिसे महर्षि अगस्त्य ने भगवान श्री राम को रावण से युद्ध के समय सिखाया था। यह स्तोत्र वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में आता है और इसमें 31 श्लोक हैं जो सूर्य देव के विभिन्न स्वरूपों और गुणों का वर्णन करते हैं।

आदित्य हृदय स्तोत्र के क्या लाभ हैं? +

नियमित पाठ से शत्रुओं पर विजय, रोगों से मुक्ति, मानसिक शांति, आत्मविश्वास में वृद्धि, चिंता-शोक का नाश, आयु में वृद्धि, और सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती है। शास्त्र कहते हैं कि यह स्तोत्र हर प्रकार के संकट से रक्षा करता है।

पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है? +

ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करना सर्वोत्तम है। रविवार और रथ सप्तमी के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

इसमें कितने श्लोक हैं? +

आदित्य हृदय स्तोत्र में कुल 31 श्लोक हैं जो अनुष्टुप छंद में रचे गए हैं। प्रत्येक श्लोक सूर्य देव के एक विशिष्ट रूप, गुण या नाम का वर्णन करता है।

क्या महिलाएं पाठ कर सकती हैं? +

हां, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कोई भी कर सकता है। सूर्य देव सब पर समान कृपा करते हैं। श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया पाठ सदैव फलदायी होता है।

क्या संस्कृत न जानने पर भी पाठ कर सकते हैं? +

अवश्य। मूल संस्कृत का सबसे गहरा प्रभाव होता है, परंतु हिंदी या अपनी मातृभाषा में भी पाठ कर सकते हैं। श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण है। हमारी वेबसाइट पर 7 भाषाओं में स्तोत्र उपलब्ध है।

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